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Deewar me ek khidaki rehati thi

Deewar me ek khidaki rehati thi

₹350

भाषा पर तो विनोद कुमार शुक्ल का अपने ढंग का अधिकार है ही-प्रेमचंद और जैनेंद्र के बाद इतनी सादा, रोज़मर्रा भाषा में शायद ही किसी और में अभिव्यक्ति की ऐसी क्षमता हो– लेकिन इस उपन्यास में उन्होंने संभाषण की कई भाषाएँ और शैलियाँ ईजाद की हैं–एक वह जिसमें रघुवर प्रसाद लोगों से बोलते हैं, दूसरी वह जिसमें वे ख़ुद से बोलते हैं, तीसरी वह जिसमें रघुवर प्रसाद और सोनसी अपने एकांत में बोलते हैं और चौथी वह जिसमें रघुवर प्रसाद परिवार आपस में बात करता है जिसमें हल्की-सी आंचलिकता मिली हुई है, और पाँचवीं वह जिसमें विभागाध्यक्ष और पाचार्य बोलते हैं–सबसे ‘ठेठ’ वही है। एक और अद्भुत भाषा वह है जिसमें बोलने वाला और सुननेवाला बारी-बारी कहते कुछ हैं और सुनते कुछ और हैं और यह एक और ही अर्थबाहुल्य स्निग्धता को जन्म देता है।-विष्णु खरे

4 months ago
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